Saturday, September 5, 2015

जन्म सहस्त्राब्दी - Krishna


सर्वपापहारी श्री कृष्णा , समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले , पतितों को  भार उतारने  वाले , मनमोहक , मन मोहना , सोलह कलाओं से परिपूर्ण , जिनका आज हम जन्म दिन मना रहे हैं।  
ऐसे पवन पर्व और अवसर पर हम सभी का मंगल हो , शुभ हो , कल्याण हो, 
इनके जन्म से ही हमें बहुत कुछ सिखने के ओ मिलता है , इनकी जीवनी हमें बहुत कुछ सिखाती है , 

आज हम सब मिलकर इस पवन पर्व पर इनसे सिखने की प्रेरणा लेकर , अपने जीवन को धन्य करे, जिससे हमारे समाज और देश का कल्याण होगा।  

जय श्री कृष्ण !

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Saturday, August 29, 2015

रक्षा बंधन या उपहार बंधन


रक्षा बंधन का अर्थ होता है जो रक्षा के लिए जो बंधन बना हो , जैसे सूत और रेशम के धागे से बंधन।  ये बंधन कोई आम बंधन नहीं है।  ये एक रक्षा कवच है , बंधने वाले के श्रद्धा भाव और पवित्र शक्ति से एक कवच तैयार करना। जिससे आपको हर प्रकार के कुदृष्टि , कुविचार , व्याधियों , हर संकट से आपकी रक्षा करे।  उसके बदले आप भी बांधने वाले की भी रक्षा करें।  ये एक वचन देना होता है।

लेकिन आज समाज में कुछ और ही प्राचलन चला है , राखी तो एक व्यापार बढ़ाने के जरिया बन गया है, ये रक्षा बंधन से ज्यादा उपहार बंधन या गिफ्ट बंधन बन गया है।  बहन और भाई , बड़े या छोटे, सभी के रिश्ते में सिर्फ रक्षा बंधन से जयादा उपहार बंधन हो कर रह गया है.

उपहार देना और लेना अच्छी चीज है ,  जिससे आपस में रिश्ते बने रहते है , लेकिन इसका ये मतलब नहीं है की , एक पवित्र त्यौहार जो आप गिफ्ट और त्यौहार पर्व बना दे।

आज हमें अपनी संस्कृति और सभ्यता को भूलना नहीं चाहिए।  आज हम लोग सभी अपने परिवार और समाज में ये बताये की हम रक्षा बंधन का पवित्र त्यौहार क्यों मानते हैं।  उन्हें ये अहसास होना चाहिए की ये सूत , धागा कोई आम धागा नहीं है , बल्कि ये रक्षा कवच है , जो सभी संकट से आपकी रक्षा करता है , उसके बदले गिफ्ट या उपहार नहीं , बल्कि आप वचन दें, की हम भी आपकी हर संकट से रक्षा करें।  

Tuesday, March 18, 2014

Famous Quotes

Kabir Das कबीर दास जी -
१.  बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
   जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

२. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
३. साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
  सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

४. . धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

५. तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

६. माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

७. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

८. दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

९. जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

१०. बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

११. अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

१२. निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

१३. दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

१४. कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.

१५. हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए, मरम न कोउ जाना।

Rahim Das रहीम दास से के दोहे !

१. रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय.
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय.

२. रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि.
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि.

३. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग.
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग.

४. रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार.
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार.

५. जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं.
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं.

६. जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह.
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह.

७.  खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय.
रहिमन करुए मुखन को, चाहिए यही सजाय.

८. दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं.
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं.

९. वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग.
बांटन वारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग.

१०. समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात.
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात.